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विश्व सिकल सेल दिवस: जागरूकता से आगे बढ़कर स्क्रीनिंग की संस्कृति विकसित करना जरूरी

विश्व सिकल सेल दिवस: जागरूकता से आगे बढ़कर स्क्रीनिंग की संस्कृति विकसित करना जरूरी

पंकज कन्नौजे,डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन, ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज रायपुर में प्रोफेसर

सिकल सेल डिजीज (एससीडी) भारत की सबसे गंभीर लेकिन अपेक्षाकृत कम पहचानी जाने वाली आनुवंशिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ने के बावजूद इसे व्यापक और व्यवस्थित स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में बदलना अभी भी बड़ी चुनौती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं सिकल सेल रोग पर कार्यरत चिकित्सक डॉ. पंकज कन्नौजे ने कहा कि एससीडी विशेष रूप से जनजातीय और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को प्रभावित करती है। यह एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जबकि सिकल सेल ट्रेट (एससीटी) वाले अधिकांश लोग स्वस्थ वाहक होते हैं और उनमें कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। स्क्रीनिंग की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग अपनी आनुवंशिक स्थिति से अनजान रहते हैं और रोग की पहचान अक्सर तब होती है जब गंभीर जटिलताएं विकसित हो चुकी होती हैं।

उन्होंने कहा कि देर से पहचान होने पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, जटिलताएं और असमय मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासों के बावजूद जनजातीय और दूरदराज के इलाकों में एससीडी स्क्रीनिंग की पहुंच अब भी असमान बनी हुई है। इन क्षेत्रों में अपर्याप्त स्वास्थ्य अवसंरचना, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी और पुष्टिकारी जांच सुविधाओं का अभाव प्रमुख चुनौतियां हैं।

डॉ. कन्नौजे ने कहा कि जहां स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध है, वहां भी अनुवर्ती देखभाल और आनुवंशिक परामर्श की कमी एक बड़ी समस्या है। कई मामलों में वाहक के रूप में पहचाने गए लोगों को आवश्यक परामर्श और दीर्घकालिक मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, जिससे स्क्रीनिंग का निवारक लाभ पूरी तरह हासिल नहीं हो पाता।

उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों को स्क्रीनिंग और जागरूकता कार्यक्रमों के महत्वपूर्ण मंच के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इससे युवाओं को प्रजनन आयु में प्रवेश करने से पहले अपनी आनुवंशिक स्थिति की जानकारी मिल सकेगी और वे स्वास्थ्य एवं वैवाहिक संबंधी निर्णय अधिक जागरूकता के साथ ले सकेंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सहयोग पर आधारित मॉडल सिकल सेल रोग की रोकथाम और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के माध्यम से निदान सुविधाओं का विस्तार, दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच और विकेंद्रीकृत जांच सेवाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक सिकल सेल रोग उन्मूलन के राष्ट्रीय मिशन ने इस दिशा में एक मजबूत आधार तैयार किया है। हालांकि इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को और सशक्त बनाने, मोबाइल डायग्नोस्टिक नेटवर्क का विस्तार करने तथा स्क्रीनिंग, परामर्श और उपचार को एकीकृत करने की आवश्यकता होगी।

विश्व सिकल सेल दिवस के अवसर पर डॉ. कन्नौजे ने कहा कि सिकल सेल रोग के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार केवल उपचार नहीं, बल्कि समय पर पहचान, आनुवंशिक परामर्श और समुदाय आधारित स्क्रीनिंग है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जागरूकता को व्यवहारिक कार्रवाई में बदलना ही इस बीमारी के बोझ को कम करने और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।

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