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नंदा देवी मंदिर कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र

नंदा देवी मंदिर कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र

निर्मल उप्रेती
अल्मोड़ा। अल्मोड़ा में ऐतिहासिक नंदा देवी मेले की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। 16 सितंबर से शुरू होने वाला यह मेला सात दिनों तक चलेगा। करीब दो सौ साल पुराने इस मेले की शुरूआत चंदवंशीय शासनकाल से मानी जाती है। देवभूमि की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा और सुनंदा को समर्पित इस मेले की अपनी अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। यहां केले की खाम यानी शाखाओं से मां नंदा और सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। नंदाष्टमी के दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद दशमी के दिन मां नंदा-सुनंदा की डोली नगर भ्रमण के लिए निकाली जाएगी। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक अल्मोड़ा पहुंचते हैं। मेले को लेकर मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सजावट से लेकर तमाम व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

अल्मोड़ा की ऐतिहासिक नंदा देवी और नंदा देवी मेला

नंदा देवी मंदिर कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक-संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक जीवन का प्रमुख उत्सव है। नंदा देवी कुमाऊ चंद वंश की कुलदेवी माना जाता है और ‘नंदा’ शब्द का संबंध समृद्धि से जोड़ा जाता है। अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर का निर्माण चंद राजाओं के समय हुआ था। तत्कालीन शासक द्योत चंद ने नंदा का मंदिर बनवाया था। अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला इन दिनों अल्मोड़ा का वातावरण धार्मिक उत्साह और लोक-सांस्कृतिक रंगों से भर जाता है नंदा देवी को कुमाऊं की लोक-आस्था, समृद्धि और मातृशक्ति का प्रतीक माना जाता है। मेले के माध्यम से लोग देवी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तथा सदियों पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। नंदा देवी की पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है; नंदा देवी कुमाऊँ के लोकगीतों और लोक-संस्कृति में भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

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