नई दिल्ली। भारत के शहरों से हर दिन बड़ी मात्रा में जैविक कचरा निकलता है। सब्जियों और फलों के छिलके, बचा हुआ खाद्य पदार्थ और खराब हो चुकी उपज अक्सर कूड़ाघरों और लैंडफिल तक पहुंच जाती है। हालांकि, यह जैविक कचरा वास्तव में मिट्टी के लिए बहुमूल्य पोषक तत्वों का स्रोत हो सकता है। यदि इसे सही तरीके से संसाधित किया जाए तो यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और कृषि को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
‘पृथ्वी रक्षक’ बना जैविक कचरे से मिट्टी की सेहत सुधारने का स्मार्ट समाधान
इसी सोच के साथ युवा नवाचारकर्ता अभिषेक ढांडा और प्रभकिरत सिंह ने ‘पृथ्वी रक्षक’ नामक एक अभिनव समाधान विकसित किया है। यह एक सेंसर-आधारित मॉड्यूलर वर्मीकम्पोस्टिंग प्लेटफॉर्म है, जो जैविक कचरे को उसके स्रोत पर ही संसाधित कर उपयोगी जैविक संसाधनों में बदल देता है। इस प्रक्रिया से वर्मीकम्पोस्ट, वर्मीवॉश और वर्मीस्टिक्स जैसे उत्पाद तैयार होते हैं, जो मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और बागवानी व खेती में उपयोगी साबित होते हैं।
30 दिन में कचरे से तैयार होगा वर्मीकम्पोस्ट, युवाओं ने विकसित की अनोखी तकनीक
‘पृथ्वी रक्षक’ की विशेषता इसकी स्मार्ट तकनीक है। इसमें लगे सेंसर लगातार तापमान, नमी और वायु प्रवाह की निगरानी करते हैं, जिससे जैविक अपघटन के लिए आदर्श वातावरण बना रहता है। जहां पारंपरिक वर्मीकम्पोस्टिंग में लगभग 90 दिन लगते हैं, वहीं यह प्रणाली मात्र 30 से 38 दिनों में प्रक्रिया पूरी कर देती है। इससे घरों, विद्यालयों, आवासीय परिसरों और बाजारों में विकेंद्रीकृत कम्पोस्टिंग को बढ़ावा मिल सकता है।
अभिषेक और प्रभकिरत का नवाचार: जैविक कचरे को बना रहा खेती के लिए उपयोगी संसाधन
यह नवाचार केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘चक्रीय कृषि’ की अवधारणा को भी मजबूत करता है। इसके माध्यम से शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले जैविक कचरे को ऐसे संसाधनों में बदला जा सकता है, जो मिट्टी की सेहत सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद करें। यह शहरों और कृषि क्षेत्रों के बीच पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जैविक कचरे को धन में बदलने की तकनीक, ‘पृथ्वी रक्षक’ को मिला राष्ट्रीय सम्मान
अभिषेक और प्रभकिरत ने अपने इस विचार को सैमसंग के प्रमुख नवाचार कार्यक्रम सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो के माध्यम से और अधिक विकसित किया। कार्यक्रम के तहत उन्हें विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, डिजाइन थिंकिंग की समझ और नवाचार से जुड़े व्यापक इकोसिस्टम का सहयोग मिला। इसके परिणामस्वरूप उनका विचार एक व्यावहारिक और प्रभावी समाधान के रूप में सामने आया।
उनके इस नवाचार को सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो 2025 में राष्ट्रीय विजेता का सम्मान मिला। साथ ही उन्हें आईआईटी दिल्ली के फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (एफआईआईटी) में एक करोड़ रुपये की इन्क्यूबेशन सहायता भी प्रदान की गई। इस सहयोग ने उनके शोध, उत्पाद विकास और व्यावसायिक विस्तार को नई गति दी।
सैमसंग भारत में अपने 30 वर्ष पूरे कर रहा है और इसी के साथ सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो कार्यक्रम के पांचवें संस्करण की शुरुआत भी कर चुका है। इस बार कार्यक्रम के तहत इन्क्यूबेशन सहायता राशि बढ़ाकर दो करोड़ रुपये कर दी गई है। ‘पृथ्वी रक्षक’ इस बात का उदाहरण है कि जब युवाओं को नवाचार के लिए सही मंच और संसाधन मिलते हैं, तो वे समाज और पर्यावरण की जटिल चुनौतियों का प्रभावी समाधान खोज सकते हैं।










