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शताब्दियों से देवीधुरा की बगवाल को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं, खामों के प्रमुख

शताब्दियों से देवीधुरा की बगवाल को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं, खामों के प्रमुख
  • वंश परंपरा के अनुसार तैयार होते आ रहे हैं खाम प्रमुख।
  • खामों के लोग इन्हें देते आ रहे हैं पूरा मान और सम्मान।

पायनियर समाचार सेवा। देवीधुरा। विश्व प्रसिद्ध मां बज्र बाराही धाम में होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल केवल पत्थरों की परंपरागत लीला नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का महानुष्ठान है। इस परंपरा को जीवंत रखने में यहां की चार खामों और उनके प्रमुखों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रत्येक खाम के अधीन दर्जनों गांवों के लोग जुड़े हैं, जिन्हें पड़तीदार कहा जाता है। बग्वाल के दिन यही पड़तीदार अपनी-अपनी खाम के समर्थन में देवीधुरा पहुंचते हैं। खाम प्रमुखों को यहां ह्यप्रधानह्ण के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। धार्मिक एवं परंपरागत आयोजनों में उनकी सहमति और दिशा-निर्देशन को महत्वपूर्ण माना जाता है। खाम से जुड़े लोग उनके निदेर्शों के अनुसार अपनी परंपराओं और जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। देवीधुरा की बग्वाल में लमगड़िया, वालिक, चम्याल और गहड़वाल खाम के लोग भाग लेते हैं, जिन्हें भागवाली वीर कहा जाता है। यहां बग्वाल को युद्ध नहीं, बल्कि मां बाराही को प्रसन्न करने वाला पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। चारों खामों में गहड़वाल खाम को बड़ी खाम माना जाता है और परंपरागत रूप से इसका अन्य तीन खामों पर नियंत्रण रहता है।

पिता से पुत्र तक पहुंच रही विरासत

गहड़वाल खाम के प्रमुख त्रिलोक सिंह बिष्ट करीब 15 वर्ष की उम्र से बग्वाल खेलते आ रहे हैं और अब उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंचने के बावजूद इस परंपरा से जुड़े हैं। उनके पिता भोपाल सिंह अनुशासनप्रिय और कड़े स्वभाव के साथ ही सरल एवं मृदुभाषी व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। लमगड़िया खाम के प्रमुख वीरेंद्र सिंह लमगड़िया वर्तमान में अन्य खाम प्रमुखों की तुलना में कम उम्र के हैं। उनके पिता बहादुर सिंह लमगड़िया अपने समय में अनुशासनप्रिय खाम प्रमुख रहे और परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में जाने गए। वालिक खाम की कमान अब बद्री की बिष्ट संभाल रहे हैं। उनके पिता खुशाल सिंह ने लंबे समय तक खाम का नेतृत्व किया। वहीं चम्याल खाम के प्रमुख गंगा सिंह अपने पिता गोपाल सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बताया जाता है कि गोपाल सिंह ने जीवन के अंतिम समय तक बग्वाल में भाग लिया। खाम प्रमुखों की यह परंपरा केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्वजों से मिली आस्था, अनुशासन और जिम्मेदारी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जीवंत मिसाल है। यही विरासत मां बाराही धाम की बग्वाल को आज भी विशिष्ट पहचान देती है।

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