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न अपनी बंदूक, न पक्की शूटिंग रेंज... 7 साल की तपस्या से गोल्डन गर्ल बनीं नीरू

प्रतियोगिता से करीब 10 दिन पहले वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। पांच दिन तक उन्होंने कुछ नहीं खाया और पूरे प्रशिक्षण शिविर में अभ्यास भी नहीं कर सकीं। इसके बावजूद कोच मनशेर सिंह लगातार उनके संपर्क में रहे और उनका हौसला बनाए रखा।

न अपनी बंदूक, न पक्की शूटिंग रेंज... 7 साल की तपस्या से गोल्डन गर्ल बनीं नीरू
महिलाओं के ट्रैप शूटिंग व्यक्तिगत इवेंट के विक्ट्री सेरेमनी के दौरान भारत की नीरू ढांडा अपने गोल्ड मेडल और इवेंट के मैस्कॉट के साथ पोज़ देती हुईं।

नागोया। कभी उधार की बंदूक, तालाब किनारे टिन का डिब्बा और रिश्ते के भाई का हौसला ही नीरू ढांडा की निशानेबाजी की दुनिया थी। सात साल बाद वही नीरू मंगलवार को एशियाई खेलों के निशानेबाजी मंच पर इतिहास रचते हुए भारत की पहली महिला बन गईं, जिन्होंने व्यक्तिगत शॉटगन स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता।हरियाणा के जींद जिले के किसान परिवार से आने वाली 26 वर्षीय नीरू के पास 2019 में भोपाल पहुंचने के समय निशानेबाजी का महज छह महीने का अनुभव था। न महंगे उपकरण थे और न ही बड़े प्रशिक्षण की सुविधाएं। रिश्ते के भाई लक्ष्य श्योराण ने 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता तो नीरू को भी निशानेबाजी में हाथ आजमाने की प्रेरणा मिली।

शुरुआत इतनी साधारण थी कि उन्होंने लक्ष्य के पिता की भारतीय निर्मित बंदूक लेकर भोपाल के एक तालाब के पास अभ्यास किया। टिन के डिब्बे को निशाना बनाकर वह खुद ही प्रयास और गलतियों से निशाना साधना सीखती रहीं। नीरू के लिए यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर बड़े सपने की नींव बनी। लक्ष्य के माता-पिता उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर गए। वहां उन्हें मुफ्त बंदूक और कारतूस के साथ प्रशिक्षण की सुविधा मिली। किसान पिता और गृहिणी मां के परिवार के लिए निशानेबाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था। अकादमी का यह सहयोग उनके करियर के लिए निर्णायक साबित हुआ।

मंगलवार को महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ स्वर्ण जीतकर नीरू ने इस संघर्ष को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदल दिया। इसी साल इटली के लोनाटो में विश्व कप पदक जीत चुकीं नीरू ने एशियाई खेलों में महिला शॉटगन के व्यक्तिगत स्वर्ण का भारत का लंबा इंतजार भी खत्म कर दिया।दिलचस्प बात यह है कि नागोया में उतरने से पहले नीरू खुद मुश्किल दौर से गुजर रही थीं। प्रतियोगिता से करीब 10 दिन पहले वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। पांच दिन तक उन्होंने कुछ नहीं खाया और पूरे प्रशिक्षण शिविर में अभ्यास भी नहीं कर सकीं। इसके बावजूद कोच मनशेर सिंह लगातार उनके संपर्क में रहे और उनका हौसला बनाए रखा।

नागोया में बारिश और गिरते तापमान ने भी चुनौती बढ़ाई। बारिश के कारण बंदूक पर पकड़ और निशाना साधने का परिचित अंदाज प्रभावित हुआ। लेकिन नीरू के प्रशिक्षण में ऐसी परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी कराई जाती थी। उनके कोच अभ्यास के दौरान तेज संगीत और दूसरे व्यवधान पैदा करते हैं, यहां तक कि कभी जैकेट खींचकर या सामने कुर्सी रखकर उनका ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं।नीरू ने कहा कि जब दिल में पूरा समर्पण हो तो बाधाएं मायने नहीं रखतीं। उनके लिए यह पदक परिवार, देश, भारतीय सेना और मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी से जुड़े हर उस व्यक्ति की मेहनत का परिणाम है, जिसने उनके सफर में साथ दिया।

सेना की निशानेबाज नीरू ने अपना स्वर्ण देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे सैनिकों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि सैनिक देश के लिए अपनी जान तक कुर्बान करते हैं और उनके सामने सेना के लिए खेलना और जीतना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।नीरू ने अपना स्वर्ण 1978 एशियाई खेलों के चैंपियन राजा रणजीत सिंह को भी समर्पित किया, जिनका इसी वर्ष निधन हुआ। जिस सफर की शुरुआत उधार की बंदूक और टिन के डिब्बे से हुई थी, वह अब एशियाई स्वर्ण के साथ भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में दर्ज हो चुका है।
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