किसान दिवस: जिला स्तरीय अधिकारियों पर लटकी कार्रवाई की तलवार

- किसानों की समस्याओं से टूटा नाता, सूत्रों के अनुसार कागजों में चल रही मौजूदगी की कहानी
- हर बैठक से पहले जारी होता है फरमान, फिर भी गायब रहते हैं जिम्मेदार अधिकारी
- उपस्थिति रजिस्टर की निष्पक्ष जांच हुई तो खुल सकती है पोल, बहानों के पीछे छिपे चेहरों पर उठेंगे सवाल
पायनियर संवाददाता
। महराजगंज
किसानों की समस्याएं सुनने के लिए आयोजित किसान दिवस में जब जिम्मेदार अधिकारी ही मौके पर उपस्थित नहीं रहेंगे, तो समाधान की उम्मीद आखिर किससे की जाए? किसान दिवस की बैठकों में अधिकारियों की गैरहाजिरी को लेकर उठ रहे सवालों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। सूत्रों के अनुसार चर्चा है कि करीब 32 जिला स्तरीय अधिकारी में से अधिकांश अधिकारी किसान दिवस में समय से उपस्थित नहीं होते हैं। यदि उपस्थिति रजिस्टर की निष्पक्षता और बारीकी से जांच हुई, तो कई ऐसे नाम सामने आ सकते हैं, जिनकी कुर्सियां तो सरकारी दफ्तरों में सलामत हैं, लेकिन किसानों की समस्याएं सुनने के लिए उनकी मौजूदगी नहीं बताई जा रही है।विडंबना देखिए, किसानों की समस्याओं के निस्तारण के लिए बाकायदा महीने के हर तीसरे बुधवार को किसान दिवस आयोजित किया जाता है। संबंधित अधिकारियों को पत्र जारी कर बैठक में उपस्थित रहने की हिदायत भी दी जाती है। बावजूद कुछ अधिकारियों पर इस निर्देश का कोई खास असर पड़ता दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है मानों किसान दिवस में शामिल होना उनकी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सुविधा के हिसाब से चुना जाने वाला कोई वैकल्पिक कार्यक्रम हो।
करते रहे इंतजार, पर नहीं आते अधिकारी
किसान अपनी समस्याओं को लेकर किसान दिवस में पहुंचते हैं। किसी को सिंचाई की चिंता है, किसी को खाद-बीज की परेशानी, तो कोई राजस्व और सरकारी योजनाओं से जुड़ी शिकायत लेकर पहुंचता है। किसानों को उम्मीद रहती है कि संबंधित विभाग का अधिकारी उनकी बात सुनेगा और समाधान का रास्ता निकालेगा। लेकिन जब जिम्मेदार अधिकारी ही बैठक से गायब रहें, तो किसानों की फरियाद सुनने वाला कौन होगा?करीब छह महीने से किसानों और कुछ जिला स्तरीय अधिकारियों के बीच संवाद का अभाव रहने की बात सामने आ रही है। यदि यह स्थिति सही पाई जाती है, तो यह केवल बैठकों में अनुपस्थिति का मामला नहीं, बल्कि किसानों की समस्याओं के प्रति जवाबदेही का भी सवाल है।चिट्ठी जारी, मगर जिम्मेदारों पर असर कितना?
किसान दिवस की बैठक से पहले संबंधित अधिकारियों को उपस्थित रहने के लिए सूचना और निर्देश दिए जाते हैं। यानी किसी अधिकारी के पास बैठक की जानकारी नहीं थी, ऐसा कहकर जिम्मेदारी से बच निकलना आसान नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद यदि अधिकारी अनुपस्थित रहते हैं, तो प्रशासनिक निर्देशों की गंभीरता और उनके पालन की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।मामले में उपस्थिति रजिस्टर अहम दस्तावेज साबित हो सकता है। बैठकवार उपस्थिति, अनुपस्थिति के कारण और संबंधित अधिकारियों से प्राप्त स्पष्टीकरण की जांच की जाए, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। हालांकि, करीब 32 अधिकारियों की गैरहाजिरी और उनके विरुद्ध कार्रवाई की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस मामले में केवल कागजी खानापूर्ति करता है या जवाबदेही भी तय करता है।
जादुई रजिस्टर खोलेगा राज या फिर फाइलों में ही दब जाएगी शिकायत?
किसान दिवस के उपस्थिति रजिस्टर को लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे मामले को दिलचस्प बना दिया है। यदि रजिस्टर की निष्पक्ष जांच हुई, तो बैठकों में कौन उपस्थित रहा, कौन अनुपस्थित रहा और किसने क्या कारण बताया, इसकी तस्वीर सामने आ सकती है। यही दस्तावेज कथित लापरवाही की जांच का आधार बन सकता है।अब सवाल यह है कि छह महीने तक किसानों से दूरी बनाए रखने के आरोपों की जांच कब होगी और जिम्मेदार पाए जाने वालों पर क्या कार्रवाई की जाएगी? किसान दिवस का उद्देश्य किसानों की समस्याओं का समाधान करना है, न कि अधिकारियों की अनुपस्थिति का हिसाब लगाने के लिए हर बार नया पन्ना खोलना। यदि बैठक में मौजूद रहने के निर्देशों के बावजूद अधिकारी गैरहाजिर पाए जाते हैं, तो जवाबदेही तय करना जरूरी है।किसानों को आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए; बैठकों की औपचारिकता नहीं, जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी चाहिए।



