उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में युवा पीढ़ी और विशेषकर छात्रों को एक बेहद व्यावहारिक किंतु गहरे अर्थों से युक्त सलाह दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चे सोशल मीडिया से दूरी बनाएं, प्रतिदिन अखबार पढ़ें और अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित करें। सतही तौर पर देखने वाले शायद इसे केवल एक सामान्य प्रशासनिक या पारंपरिक अभिभावकीय उपदेश मानकर छोड़ दें, लेकिन यदि हम इसके अंतर्निहित संदेश की गहराई में उतरें, तो यह वक्तव्य आधुनिक बच्चों की चेतना को ग्रस रहे एक बहुत बड़े मानसिक और सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। हम वर्तमान में जिस तथाकथित ‘सूचना युग’ में जी रहे हैं, वह वास्तव में ज्ञान का नहीं बल्कि तीव्र भटकाव का युग बन चुका है। आज की युवा पीढ़ी जिस वर्चुअल दुनिया में अपनी सांसें ले रही है, वह उसे वैचारिक स्पष्टता देने के बजाय सूचनाओं के एक ऐसे दलदल में धकेल रही है जहां चिंतन की मौलिकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। मोबाइल का उपयोग संवाद के लिए होना चाहिए अथवा किसी जिज्ञासा के समाधान के लिए होना चाहिए परन्तु आजकल नई पीढ़ी मोबाइल का दुरुपयोग करके अपना अमूल्य समय नष्ट कर रही है। इस गंभीर पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की यह त्रिसूत्रीय सलाह केवल शिक्षा पद्धति में सुधार की बात नहीं करती, बल्कि यह आधुनिक समाज में असमय बिखर रही छात्र चेतना को सहेजने का एक प्रामाणिक जीवन दर्शन प्रस्तुत करती है।
आधुनिक दौर में सोशल मीडिया का जो स्वरूप हमारे सामने है, वह फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यां बोद्रिला की ‘हाइपररियलिटी’ यानी अति-यथार्थ की अवधारणा को पूरी तरह चरितार्थ करता है। यह एक ऐसी आभासी दुनिया का निर्माण है जो वास्तविक धरातल से कहीं अधिक आकर्षक, रंगीन और सच्ची प्रतीत होने लगती है। इस मायाजाल में उलझा हुआ छात्र धीरे-धीरे अपनी वास्तविक परिस्थितियों से कट जाता है। सोशल मीडिया पर निरंतर चलने वाला ‘लाइक’, ‘शेयर’ और ‘कमेंट्स’ का अंतहीन खेल मानव मस्तिष्क में डोपामाइन नामक न्यूरोकेमिकल का एक कृत्रिम और तात्कालिक प्रवाह बढ़ाता है। यह क्षणिक आनंद छात्रों को एक छद्म संतुष्टि देता है, जिससे वे वास्तविक जीवन के अकादमिक और व्यावहारिक संघर्षों से दूर भागने लगते हैं। गहराई से देखा जाए तो सोशल मीडिया व्यक्ति को आत्म-केंद्रित और आत्मकेंद्रित सनक से तो भर देता है, लेकिन उसे आत्म-जागरूक या आत्म-विश्लेषक नहीं बनने देता। जब छात्र का ध्यान हर कुछ समय रील्स और शॉर्ट्स के माध्यम से बदलता रहता है, तो उसकी एकाग्रता की अवधि इतनी संकुचित हो जाती है कि वह किसी भी विषय की गहराई में उतरने में असमर्थ हो जाता है। ऐसी विकृत मानसिक स्थिति में उपनिषदों की दार्शनिक गहराई या विज्ञान के जटिल सिद्धांतों को आत्मसात करना सर्वथा असंभव है।
इस संकट के समाधान के रूप में मुख्यमंत्री ने मुद्रित माध्यमों यानी रोज अखबार पढ़ने पर विशेष बल दिया है। डिजिटल स्क्रीन पर पढ़ने और छपे हुए कागज के पन्नों को पलटने के बीच एक गहरा संज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक अंतर होता है। डिजिटल स्क्रीन पर हमारी आंखें केवल तैरती हैं, जिसे तकनीकी भाषा में ‘स्किमिंग’ कहा जाता है; वहां हम केवल मुख्य शब्दों को छूते हुए आगे निकल जाते हैं। इसके विपरीत, मुद्रित अक्षर अथवा अखबार को पढ़ना एक बेहद धीमी, सुव्यवस्थित और शांत प्रक्रिया है। जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर के शब्दों में कहें तो यह मुद्रित माध्यम ही है जो मनुष्य के भीतर ‘मननशील सोच’ को पुनर्जीवित रखता है। अखबार केवल तात्कालिक घटनाओं की सूचना भर नहीं देता, बल्कि वह उन घटनाओं को एक ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में पिरोकर प्रस्तुत करता है। जब एक छात्र नियमित रूप से अखबार के संपादकीय और वैचारिक पृष्ठों से गुजरता है, तो वह महज सूचनाओं को रटता नहीं है, बल्कि समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र और दर्शन के विभिन्न आयामों के मध्य एक मजबूत तार्किक पुल का निर्माण करता है। यह अनुशासित प्रक्रिया छात्रों के भीतर उस विवेक को जाग्रत करती है जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र और राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है।
इस त्रिसूत्रीय दर्शन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ स्वाध्याय और पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित करना है। प्राचीन भारतीय वांग्मय में विद्या को केवल आजीविका का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि इसे व्यक्तित्व का विकास करते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्ति का द्वार कहा गया है। आज के संदर्भ में यह मुक्ति किसी सांसारिक बंधन से अधिक इस डिजिटल लत, सतही विचारों और मानसिक अशांति से मुक्ति है। जब पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने की बात की जाती है, तो वह वास्तव में हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा के ‘स्वाध्याय’ का ही आधुनिक स्वरूप है। एकाग्रता ही वह आंतरिक वातावरण है जिससे होकर सच्चा ज्ञान अंतरात्मा में प्रवेश करता है। स्वामी विवेकानंद ने भी बार-बार रेखांकित किया था कि वास्तविक शिक्षा का अर्थ केवल सूचनाओं का अंबार इकट्ठा करना नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता को साधने की शक्ति प्राप्त करना है। यदि छात्र की चेतना सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन से हर दो मिनट में खंडित होती रहेगी, तो वह ज्ञान के उस गहन प्रवाह को कभी स्पर्श नहीं कर पाएगा जहां मौलिक और युगांतरकारी विचारों का प्राकट्य होता है।
वर्तमान समय का युवा अनजाने में ही उपभोक्तावादी संस्कृति का सबसे बड़ा शिकार बन चुका है। वह डिजिटल मंचों पर विचारों का निर्माता बनने के बजाय दूसरों द्वारा परोसी गई निरर्थक सामग्री का केवल मूक भोक्ता बनकर रह गया है। मुख्यमंत्री की यह व्यावहारिक सीख इसी उपभोक्तावादी मानसिक दासता के विरुद्ध एक वैचारिक शंखनाद है। वे युवाओं को मात्र एक दर्शक की भूमिका से ऊपर उठाकर एक सक्रिय विचारक और सृजक के रूप में देखना चाहते हैं। *मेरा अपना निजी अनुभव है की हम लोग दैनिक जीवन में १८-१८ घंटे काम करते हैं परंतु अफÞसोस होता है कि अपने बाल्यकाल या विद्याध्यययन काल में अगर १८ घण्टे पढ़ लिए होते तो बहुत ज्ञानार्जन कर लेते और उससे जीवन सफलता की ऊँचाइयाँ स्पर्श करते।
हमारे ही साथ के जिन लोगो ने अपने अध्ययन काल में पढ़ाई में मन लगाया वह अत्यधिक सफल जीवन व्यतीत कर रहे है, हमारे परिवार के बढ़े बूढ़े कहते थे की विद्या अध्ययन करने से प्राप्त होती है और बुद्धि कर्म के अनुसार बढ़ती है , इसलिए विद्यार्थियों को अपना मन अध्ययन में लगाना चाहिए* जब देश का कोई युवा अपने हाथ से स्मार्टफोन को दूर रखकर किसी गंभीर पुस्तक या अखबार को उठाता है, तो वह एक आभासी भ्रम से मुक्त होकर वास्तविक धरातल पर कदम रखता है। किसी भी राष्ट्र का वास्तविक सामर्थ्य उसकी गगनचुंबी अट्टालिकाओं से नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी की वैचारिक सुदृढ़ता से मापा जाता है। अंतत:, योगी आदित्यनाथ का यह आह्वान केवल एक तात्कालिक परामर्श नहीं है, बल्कि भटकाव से एकाग्रता की ओर तथा आभासी असत्य से वास्तविक शाश्वत सत्य की ओर बढ़ने का एक पावन दार्शनिक मार्ग है जिसे अपनाकर ही एक प्रबुद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र का स्वप्न साकार किया जा सकता है।

डॉ. देवेंद्र सिंह
प्रधान संपादक










