उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर नहीं होने के कारण राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंजूरी के बाद अब प्रदेश के सभी ग्राम प्रधान अगले छह महीने तक प्रशासक की भूमिका में कार्य करेंगे। मंगलवार से यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू हो जाएगी।
दरअसल, प्रदेश के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा था। पहले ऐसी स्थिति में सरकार एडीओ पंचायत को प्रशासक नियुक्त करती थी, लेकिन इस बार सरकार ने गांवों में विकास योजनाओं की निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से प्रधानों को ही जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया है।
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इस फैसले के साथ यह भी लगभग स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव 2027 के बाद ही कराए जाएंगे। प्रदेश में कुल 27,694 ग्राम प्रधान हैं। पहली बार ऐसा हुआ है जब चुनाव होने तक ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाया गया है। इससे पहले एडीओ पंचायत को यह जिम्मेदारी दी जाती रही है।
बताया जा रहा है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर यूपी सरकार ने भी यह मॉडल अपनाया है। राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संघ लंबे समय से सरकार से यही मांग कर रहा था।
पंचायत चुनाव में देरी की मुख्य वजह इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रही प्रक्रिया, ओबीसी आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट और पंचायत मतदाता सूची का पूरी तरह तैयार न होना बताया जा रहा है। इन कारणों से चुनाव लगभग एक साल तक टल सकते हैं।
हाल ही में योगी मंत्रिमंडल ने पंचायतों में ओबीसी आरक्षण को अंतिम रूप देने के लिए एक आयोग का गठन किया है। इस आयोग की अध्यक्षता इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज राम अवतार सिंह कर रहे हैं। आयोग में दो सेवानिवृत्त जिला जज और दो रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों को भी शामिल किया गया है।
आयोग को अपनी रिपोर्ट छह महीने के भीतर सरकार को सौंपनी है। संभावना है कि नवंबर 2026 तक रिपोर्ट सरकार को मिल जाएगी, जिसके बाद पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण को लेकर अंतिम फैसला लिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 4 फरवरी 2025 को राज्य सरकार को ओबीसी आयोग गठित करने का निर्देश दिया था।









