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डेवलपर मनसुख शाह और पुत्र आकाश शाह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

डेवलपर मनसुख शाह और पुत्र आकाश शाह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

मुंबई। 20 अप्रैल, 2026 को दिंडोशी सत्र न्यायालय ने डेवलपर द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। न्यायाधीश हाउसकॉन से जुड़े डेवलपर मनसुख शाह की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने मनसुख शाह और उनके बेटे आकाश शाह के खिलाफ मामला दर्ज किया है। उन पर एक व्यवसायी को पुनर्विकास परियोजना में ₹5.15 करोड़ का निवेश करने के लिए प्रेरित करने का आरोप है। समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से, उन्होंने उच्च रिटर्न का वादा किया और मलाड में एक संपत्ति पर विकास अधिकार होने का झूठा दावा किया। हालांकि, बाद में उन्होंने कथित तौर पर अनुबंध की शर्तों को पूरा नहीं किया।

मनसुख और आकाश शाह ने सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए दोनों ने उच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया था। शिकायतकर्ता-निवेशक, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता आबाद पोंडा और सुवर्णा वास्त कर रहे थे, ने इस आवेदन का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले में राहत देना—जबकि उनकी जमानत याचिका पहले से ही सत्र न्यायालय में लंबित थी—एक गलत मिसाल कायम करेगा।

यह मामला धोखाधड़ी की एक FIR से जुड़ा है, जो शुरू में कस्तूरबा मार्ग पुलिस स्टेशन में शाह हाउसकॉन के खिलाफ दर्ज की गई थी। आगे की जांच के लिए मामला बाद में EOW को स्थानांतरित कर दिया गया। FIR के अनुसार, 6 मई, 2025 को एक टर्म शीट पर हस्ताक्षर किए गए, उसके बाद 17 मई, 2025 को एक MoU और 16 जुलाई, 2025 को एक पूरक MoU पर हस्ताक्षर किए गए। ये समझौते 5,600 वर्ग मीटर के प्लॉट के विकास के लिए किए गए थे, जिसमें 4.5 लाख वर्ग फुट का प्रस्तावित बिक्री घटक शामिल था।

शाह हाउसकॉन महत्वपूर्ण पुनर्विकास गतिविधियों को पूरा करने में विफल रहा, जैसे कि रहने वालों को हटाना, स्पष्ट स्वामित्व स्थापित करना और संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय करना। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि भूमि के विकास अधिकारों के बारे में भ्रामक जानकारी दी गई, क्योंकि भूमि का स्वामित्व कथित तौर पर एक धर्मार्थ ट्रस्ट के पास था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसी प्लॉट के लिए अन्य डेवलपर्स के साथ समानांतर समझौते किए, उनसे बड़ी रकम वसूली, और बाद में अतिरिक्त ₹25 करोड़ की मांग की। जब इस मांग को अस्वीकार कर दिया गया, तो कथित तौर पर धमकियां दी गईं और समझौतों को समाप्त करने के नोटिस भेजे गए।

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