झिझिया-टेसू विवाह से जीवंत हुई लोक संस्कृति बच्चों ने निभाईं सदियों पुरानी परंपराएं

पायनियर संवाददाता।जालौन
आधुनिकता के दौर में जहां पुरानी लोक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं वहीं जनपद जालौन के ग्राम रूरा में झिझिया-टेसू विवाह समारोह ने लोक संस्कृति की अनूठी छटा बिखेरकर नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का संदेश दिया। दशहरे के बाद शरद पूर्णिमा के अवसर पर सोमवार की रात आयोजित इस पारंपरिक कार्यक्रम में बच्चों और ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। लोकगीतों, ढोलक की थाप और विवाह की रस्मों के बीच पूरा गांव उत्सव के रंग में रंगा नजर आया।
ग्राम रूरा में झिझिया और टेसू के प्रतीकात्मक विवाह को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा और रीति-रिवाजों के साथ जब गांव की गलियों से झिझिया-टेसू की बारात निकली तो माहौल उल्लासमय हो गया। बच्चों ने विवाह की विभिन्न रस्मों का अभिनय कर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। झिझिया-टेसू विवाह दशहरे के बाद गांव में पीढ़ियों से मनाया जाता रहा है। इसमें झिझिया को दुल्हन और टेसू को दूल्हा मानकर विवाह की रस्में निभाई जाती हैं। बच्चे पारंपरिक गीत गाते हुए बारात निकालते हैं और विवाह की अन्य रस्मों का आयोजन करते हैं। इस परंपरा के माध्यम से लोकगीतों,सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक सहभागिता का महत्व समझाया जाता है। कार्यक्रम का संचालन पंडित लल्लू महाराज ने किया। आयोजन में शिशांत अवस्थी (छोटू महाराज), प्रवेंद्र प्रजापति, भाजपा नेता प्रशांत अवस्थी, ईश्वर दयाल,मदन कुमार अवस्थी, शिवशंकर सिंह, मान सिंह तोमर, सहित अनेक गणमान्य लोग एवं कार्यक्रम में सहभागिता करने वाले बच्चे मुस्कान, निक्की, बुलबुल,गुल्लों, रौनक, दृष्टि, गौरी, अनुष्का, गुनगुन, बिट्टो, पुष्पा, इच्छा, नित्या, लब्बो, प्रतीक्षा, अंशिका, रमन, तान्या, मयंक भंडारी, शिवा, प्रिंस, आदर्श, राजन, राघव, आरिब, पुष्पेंद्र, गणेश, गोलू,विवेक और लकी सहित अनेक बच्चे मौजूद रहे। ग्रामीणों ने कहा कि ऐसे आयोजन सामाजिक एकता,आपसी भाईचारे और पारिवारिक मेलजोल को मजबूत करते हैं। झिझिया-टेसू विवाह की परंपरा यह संदेश देती है कि आधुनिकता के बीच भी लोक संस्कृति की जड़ों को सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।



