बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों तक लाने में मददगार है दिल्ली का प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र

नई दिल्ली। आम बच्चों की तरह दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल में प्रवेश और अन्य बच्चों के समान ही सीखने के अवसर सुनिश्चित करने का प्रावधान है। इसके बावजूद कई दिव्यांग बच्चे कभी स्कूल तक नहीं पहुंच पाते। इसके लिए जरूरी है कि स्कूलों को अधिक समावेशी बनाया जाए। साथ ही बच्चों की जरूरतों को उनके शुरुआती वर्षों में पहचानना और समय रहते आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से सीबीएम इंडिया ट्रस्ट ने खानपुर में प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की स्थापना की थी। अप्रैल, 2025 में आधिकारिक उद्घाटन के बाद से सेंटर का मुख्य फोकस 10 वर्ष तक की उम्र के बच्चों पर रहा है, क्योंकि शुरुआती वर्षों में कदम उठाने का प्रभाव अधिक हो सकता है। हालांकि, जरूरतमंद बड़े बच्चों को भी यहां से वापस नहीं भेजा जाता। सेंटर में करीब 90 बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें से 14 बच्चे अब मुख्यधारा के स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जिनमें 9 सरकारी और 5 निजी स्कूलों में हैं। ये बच्चे स्कूल जाने के साथ सेंटर पर भी आवश्यक सपोर्ट पा रहे हैं। इनमें ऑटिज्म से जुड़े बच्चों के अलावा डाउन सिंड्रोम, चलने-फिरने से संबंधित दिव्यांगता, स्पीच एवं लैंग्वेज संबंधी दिव्यांगता और एडीएचडी वाले बच्चे शामिल हैं।
सीबीएम इंडिया ट्रस्ट के कार्यकारी निदेशक सोनी थॉमस ने कहा, “बच्चे के शुरुआती वर्ष उसके संचार, शारीरिक गतिविधियों, सीखने और सामाजिक कौशल के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए समय पर पहचान और बच्चे के साथ-साथ परिवार को सपोर्ट देना वास्तविक बदलाव ला सकता है। जब कोई बच्चा मुख्यधारा की कक्षा में पहुंचता है, तो यह उससे जुड़े सभी लोगों के प्रयासों का परिणाम होता है। सीबीएम इंडिया इन बच्चों और उनके परिवारों को लगातार सहयोग देता रहेगा, ताकि वे अपने साथियों के साथ स्कूल जीवन में पूरी तरह हिस्सा ले सकें।”
बच्चों को सेंटर तक पहुंचाने के लिए कई माध्यमों का उपयोग किया जाता है। शुरुआती महीनों में टीम ने आसपास के इलाकों में घर-घर जाकर जागरूकता अभियान चलाया और जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र (डिस्ट्रिक्ट डिसेबिलिटी रिहेबीलिटेशन सेंटर) के साथ भी सहयोग किया। अब कई परिवार अन्य अभिभावकों के कहने पर सेंटर तक पहुंच रहे हैं।
सेंटर से जुड़ने वाले प्रत्येक बच्चे का सबसे पहले आकलन किया जाता है। इसके बाद फिजियोथेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपिस्ट और विशेष शिक्षक मिलकर बच्चे की जरूरतों के आधार पर विशिष्ट लक्ष्य तय करते हैं। इन्हीं लक्ष्यों के आधार पर बच्चे के लिए व्यक्तिगत शिक्षा एवं थेरेपी का प्लान तैयार किया जाता है। बच्चा सेंटर पर नियमित सत्रों में भाग लेता है और उसकी प्रगति के अनुसार समीक्षा कर प्लान में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में माता-पिता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्हें काउंसलिंग दी जाती है और घर पर बच्चे को सपोर्ट करने के तरीके बताए जाते हैं।
सेंटर से जुड़े बच्चों में से एक है दिल्ली का छह वर्षीय अनंत, जो ऑटिज्म से पीड़ित है और उसने केंद्रीय विद्यालय में बालवाटिका में प्रवेश लिया है। वह दूसरों द्वारा बोले गए शब्दों और वाक्यांशों को दोहराता है। उसे अपनी जरूरतों को व्यक्त करने, निर्देशों का पालन करने, ध्यान बनाए रखने और हमउम्र बच्चों के साथ बातचीत करने में कठिनाई होती है। नवंबर, 2025 से वह दक्षिण दिल्ली के खानपुर स्थित एक प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र में भाषा एवं स्पीच थेरेपी, विशेष शिक्षा और ऑक्यूपेशनल थेरेपी ले रहा है।
शुरूआत में अनंत के लिए प्रभावी तरीके से बात करना, किसी बात पर ध्यान देना, लोगों से संपर्क करना और भाषा कौशल में सुधार करना प्रमुख लक्ष्य थे। अब वह अधिक स्पष्ट रूप से बोलने तथा शब्दों का इस्तेमाल अपनी बात कहने के लिए करने का प्रयास कर रहे हैं।



